रीवा जिले में आर्थिक विकास में कृषि उत्पादकता का योगदान

 

डॉ. प्रतिमा बनर्जी1, ज्योति मिश्रा2

1प्राध्यापक (वाणिज्य), शा. स्वशासी स्नातकोत्तर महाविद्यालय सतना (.प्र.)

2शोधार्थी (वाणिज्य), शा. टी.आर.एस. महाविद्यालय रीवा (.प्र.)

*Corresponding Author E-mail:

 

ABSTRACT:

किसी भी देश के आर्थिक विकास में कृषि का बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान होता है। कृषि अर्थव्यवस्था की रीढ़ होती है। कृषि से केवल भोजन तथा कच्चे माल की प्राप्ति नहीं होती है, बल्कि जनसंख्या के एक बड़े भाग को रोजगार की उपलब्ध कराता है। कृषि तथा उद्योग परस्पर एक दूसरे पर निर्भर करते है। एक क्षेत्र का विकास होने पर दूसरे क्षेत्र का भी विकास होता है। एक क्षेत्र का उत्पादन दूसरे क्षेत्र के लिए आगत बन जाता है। एक क्षेत्र के विकास होने का अर्थ है दूसरे क्षेत्र को अधिक आगतों का प्रवाह। दूसरे की सहायता करो यदि आप अपनी सहायता चाहते है।’’ यही दोनों क्षेत्रों की निर्भरता का सारांश है। जैसे-जैसे किसी देश का आर्थिक विकास होता है, वैसे-वैसे कृषि की भूमिका में भी परिवर्तन जाता है। जब द्वितीयक एवं तृतीयक क्षेत्रों का विकास होता है तो कृषि की महत्ता कम हो जाती है। कुछ समय पश्चात् कृषि क्षेत्र का राष्ट्रीय आय में हिस्सा भी कम हो जाता है, परन्तु कृषि क्षेत्र का अन्य क्षेत्रों पर निर्भरता बढ़ जाती है। कृषि तथा उद्योग दोनों एक दूसरे के पूरक है, प्रतियोगी नहीं। बिना कृषि के आधुनीकरण के औद्योगिक विकास सम्भव नहीं है क्योंकि यदि कृषि विकास नहीं होगा तो अधिकतर जनसंख्या के पास क्रयशक्ति नहीं होगी तथा बाजार का विस्तार भी नहीं होता। अतः यह बात भी सत्य है कि बिना औद्योगिकरण के कृषि विकास भी सम्भव नहीं है। अतः कृषि तथा औद्योगिक क्षेत्र का साथ-साथ विकास होना चाहिए। किसी भी अर्थव्यवस्था के विकास में कृषि का बहुत महत्वपूर्ण स्थान होता है।

 

KEYWORDS: कृषि उत्पादकता, आर्थिक विकास, कृषि अर्थव्यवस्था।

 

 


INTRODUCTION:

कृषि अर्थव्यवस्था की रीढ़ होती है। कृषि से केवल कच्चे माल की प्राप्ति नहीं होती, बल्कि जनसंख्या के एक बड़े भाग को रोजगार भी उपलब्ध भी कराता है। निम्न तथ्यों को पढ़ने के बाद आप समझ जायेंगे कि आर्थिक विकास में कृषि का क्या महत्व है या आर्थिक विकास में कृषि किस प्रकार सहायक होता है।

 

आर्थिक विकास में कृषि का महत्व

1. भोजन आवश्यकता की पूर्ति

सभी देश अपनी भोजन सम्बन्धी आवश्यकता को पूरा करने को पहली प्राथमिकता देते है। कोई भी देश अपनी सभी खाद्य आवश्यकताओं को दूसरे देश से आयात करके पूरा नहीं कर सकता है। अगर कोई देश अपनी खाद्य आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए आयात पर निर्भर है तो उसे बहुत अधिक मात्रा में आय को खर्च करना पडे़गा और खाद्य वस्तुओं पर ज्यादा ब्यय से सभी योजनाएं बिगड़ सकती है। इसलिए सरकार को खाद्य आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए कृषि उत्पादन एवं उत्पादकता को बढ़ाने के प्रयास करने चाहिए।

 

2. कच्चे माल की उपलब्धता

आर्थिक विकास की प्रारम्भिक अवस्था में कृषि से सम्बन्धित उद्योगों का विकास होता है। जैसे चीनी, सूती वस्त्र, जूट उद्योग इत्यादि केवल तभी सफल हो सकते है जब उन्हें कच्चे माल की पर्याप्त उपलब्धता हो। अतः इन उद्योगों के तीव्र विकास के लिए पर्याप्त मात्रा में कच्चे माल की उपलब्धता होनी चाहिए।

 

3. क्रय शक्ति

यदि किसी देश की कृषि की स्थिति ठीक नही है तो कृषकों की आय भी कम होगी। कृषकों की आय कम होने से औद्योगिक वस्तुओं को नहीं खरीद पायेगें तथा औद्योगिक विकास रूक जायेगा। कृषि क्षेत्र की सम्पन्नता से ही औद्योगिक विकास होता है। किसी उद्योग का प्रमुख उद्देश्य अधिक से अधिक वस्तुओं का विक्रय करना होता है और यह तभी सम्भव है जब कृषि क्षेत्र विकसित हो।

 

4. बचत तथा पूंजी निर्माण

कृषि क्षेत्र के समृद्ध होने से कृषकों की आय में वृद्धि होती है। आय में वृद्धि होने से कृषकों की बचत में वृद्धि होती है और बचत कृषकों द्वारा बैंकों अन्य बचत संस्थाओं में जमा होता है। इन बचतों का प्रयोग पूंजी निर्माण के लिए किया जाता है, जिससे आर्थिक विकास होता है। अगर कृषकों की आय कम होगी तो बचत भी कम होगी तथा पूंजी निर्माण भी कम होगा। आर्थिक विकास की प्रारम्भिक अवस्था में जनसंख्या का अधिकत्तर भाग कृषि में कार्यरत होता है, अतः औद्योगिक क्षेत्र के तीव्र विकास के लिए कृषि क्षेत्र की सम्पन्नता ज्यादा जरूरी है।

 

5. श्रम-शक्ति की पूर्ति

कृषि क्षेत्र में जनसंख्या का दबाव बहुत अधिक है। कृषि पर जनसंख्या का दबाव अधिक होने से कृषि उत्पादन भी विपरीत रूप से प्रभावित होता है। इसलिए जनसंख्या के कुछ हिस्से को हटाकर औद्योगिक क्षेत्र में लगाया जा सकता है, इससे औद्योगिक क्षेत्र का भी तेजी से विकास होगा। अधिक विकसित कृषि में श्रम की आवश्यकता कम होती है।

 

6. विदेशी मुद्रा की प्राप्ति

कृषि प्रधान देशों में औद्योगिक वस्तुएं अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में प्रतियोगिता नहीं कर पाती है, क्योंकि औद्योगिक वस्तुएं घटिया किस्म की होती है। अतः कृषि वस्तुएं ही ऐसी है जो कि अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में प्रतियोगिता का सामना कर सकती है तथा विदेशी मुद्रा प्राप्त कर सकती है।

 

कृषि उत्पादकता का योगदान

कृषि उत्पादकता से तात्पर्य किसी क्षेत्र विशेष में प्रति हेक्टेयर उत्पादन से है। कृषि उत्पादकता में मिट्टी, जलवायु, कृषि तकनीक, पूंजी एवं उर्वरकों का विशेष महत्व होता है। कुछ क्षेत्रों में अधिक उर्वरकों के प्रयोग से भी अनूकूल उत्पादन नहीं प्राप्त हो पाता है।

 

कृषि सभी उद्योगों की जननी, मानवजीवन की पोषक, प्रगति की सूचक तथा सम्पन्नता का प्रतीक मानी जाती है। यह एक प्रधान व्यवसाय होने के कारण राष्ट्रीय आय का स्रोत तथा रोजगार एवं जीवनयापन का प्रमुख साधन है। यह भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। कृषि का महत्व होने पर भी इसमें पिछड़ापन देखने को मिलता है। यद्यपित नियोजन काल के फलस्वरूप दीर्घकालीन गतिहीनता की स्थिति समाप्त हुई है, कई फसलों की उपज बढ़ाने में महत्वपूर्ण सफलता प्राप्त हुई है। खाद्यान्नों के क्षेत्र में लगभग आत्मनिर्भरता की स्थिति है। भारतीय कृषि में कई खाद्यान्नों का उत्पादन करने में विश्व में प्रमुख स्थान है परन्तु इसमें अभी भी निम्न उत्पादकता पायी जाती है। इसके कारणों को हम वर्गीकृत कर सकते हैं। जैसे- सामान्य कारण, संस्थागत कारण, तकनीकि कारण कृषि उत्पादन को बढ़ाने हेतु सरकार द्वारा कई प्रयास किये गये हैं।

 

कृषि उत्पादन उत्पादकता की प्रवृत्तियां

कृषि उत्पादन के मुख्य रूप से दो हिस्से है- खाद्यान्न तथा अखाद्यान्न भारत में कुल कृषि उत्पादन में खाद्यान्नों का हिस्सा दो तिहाई से थोड़ा कम है। यह इस बात से स्पष्ट है कि कृषि उत्पादन के सूचकांकों में खाद्यान्नों अखाद्यान्नों को क्रमशः 62.9 तथा 37.1 भार दिया गया है। खाद्यान्नों में सबसे महत्वपूर्ण चावल है। दूसरा स्थान गेहूँ का है जिसका भार 14.5 है। अखाद्यान्नों में सबसे अधिक महत्व खाद्य तेलों का है जिनका भार 12.6 है। गन्ने का भार 8.1 तथा रूई का 4.4 है।

 

कृषि उत्पादन उत्पादकता की प्रवृत्तिया सारणी मेंदी गई हैं। पहले सारणी पर विचार करें। जहॉं तक खाद्यान्न उतपादन का सम्बन्ध है, कुल उत्पादन 1950-51 में 508 लाख टन था जो आठवीं योजना में बढ़कर 1890 लाख टन तथा नौवीं योजना में 2029 लाख टन हो गया। दसवीं योजना के प्रथम वर्ष 2002-03 में सूखे की स्थिति के कारण, खाद्यान्न उत्पादन कम होकर 1748 लाख टन रह गया परन्तु 2003-04 में बढ़कर यह 2132 लाख टन हो गया। दसवीं योजना में खाद्यान्नों का उत्पादन 2022 लाख टन रहा जो नौवीं योजना के वार्षिक औसत उत्पादन से भी कम था। परन्तु दसवीं योजना के अन्तिम वर्ष 2006-07 में खाद्यान्नों का उत्पादन 2173 लाख टन के उच्च स्तर तक पहुँच गया। 2008-09 में यह और बढ़कर 2344 लाख टन तक जा पहुँचा। 2009-10 में खाद्यान्नों का उत्पादन 2182 लाख टन रह गया।

 

अध्ययन का उद्देश्य

किसी भी अध्ययन में अध्ययन का उद्देश्य सबसे महत्वपूर्ण भाग होता है इन्हीं उद्देश्यो के माध्यम से शोधकर्ता विषय का विश्लेषण करता है। अध्ययन विषय के अंतर्गत उद्देश्य केन्द्र बिन्दु होता है। विषय को प्रतिपादित करने के लिये निम्न विशिष्ट उद्देश्य रखे गये।

1.    रीवा में कृषि उत्पादकता की प्रवृत्तियो का अध्ययन करना।

2.    रीवा कृषि में प्रयुक्त तकनीकी का अनुमाना लगाना।

3.    रीवा कृषि के साथ अन्य जिलो कृषि क्षेत्रों में तुलनात्मक अध्ययन करना।

4.    रीवा कृषि उत्पादन/उत्पादकता पर तकनीकी योगदान का अध्ययन।

5.    आर्थिक विकास में कृषि उत्पादकता के प्रभाव का अध्ययन करना।

6.    कृषि क्षेत्र में होने वाली तकनीकी परिवर्तन के प्रभावों का मूल्यांकन करना।

7.    विभिन्न फसलो की उत्पादकता पर पडने वाले प्रभावों का मूल्याकंन करना

8.    परम्परागत तकनीकी अपेक्षा नवीन तकनीकी के प्रयोग से फसलो की उत्पादकता वृद्धि का मूल्याकन करना।

9.    रीवा कृषको की विभिन्न फसलो के उत्पादन की लागत का मूल्यांकन करना

10. कृषि से प्राप्त होने वाले प्रति एकड़ लाभ का अनुमान लगाना

11. रीवा जिले के कृषक की आर्थिक स्थिति का अनुमान लगाना।

12. रीवा जिले की फसल उत्पादकता के विकास दर का अनुमान लगाना।

13. 3. आर्थिक विकास के पश्चात् कृषक के आर्थिक एवं सामाजिक स्थिति में आए हुए परिवर्तन का अध्ययन करना।

14. कृषि उत्पादकता में आने वाली कठिनाईयों का पता लगाना तथा इसके निराकरण हेतु सुझाव प्रस्तुत करना।

15. रासायनिक खाद्य, उच्च किस्म के बीज, ऋणो के उपयोग, कृषि उत्पादन में होने वाले परिवर्तन का अध्ययन करना।

 

उपकल्पना

किसी भी शोध अध्ययन में उपकल्पना एक महत्वपूर्ण इकाई है। उपकल्पना के माध्यम से शोधकर्त्ता अध्ययन की सार्थकता की जाँच करता है। शोधकर्ता ने शून्य परिकल्पना को निर्मित किया है जो निम्नलिखित है %&

1.    रीवा में कृषि विकास की प्रवृत्तियो में कोई परिवर्तन नहीं हुआ।

2.    रीवा जिले में आर्थिक विकास में कृषि उत्पादकता का स्तर बहुत निम्न है।

3.    3रीवा कृषि में तकनीकी अनुप्रयोग नगण्य है।

4.    रीवा कृषि तकनीकी अनुप्रयोग कृषि उत्पादकता पर प्रभाव नहीं डाला जिसके फलस्वरूप आर्थिक विकास की दिशा में कोई परिवर्तन नहीं हुआ।

5.    रीवा कृषि के साथ अन्य जिलो का तुलनात्मक अध्ययन नहीं किया गया।

6.    आर्थिक विकास के पश्चात् कृषक के आर्थिक एवं सामाजिक स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं आया।

7.    प्राकृतिक संसाधनो का प्रयोग में कोई परिवर्तन नहीं हुआ इसका दुरुप्रयोग अधिक पाया गया है।

8.    कृषक के कृषि से प्राप्त होने वाले प्रति एकड़ लाभ का कोई अनुमान नहीं लगाया गया।

9.    रीवा जिले के कृषको के आर्थिक एवं सामाजिक स्थिति काफी निम्न है, क्योंकि मजदूरी दर कम होने के कारण इनकी स्थिति में कोई भी परिवर्तन नहीं पाया गया है।

10. रीवा में जल की मात्रा अधिक होने के वाबजूद फसलो में सिंचाई की मात्रा में कमी इस समस्या का निराकरण करना।

 

अध्ययन का क्षेत्र %

प्रस्तावित शोध प्रबंध के अध्ययन में मध्यप्रदेश के रीवा जिले को अध्ययन की इकाई मानते हुए कृषि उत्पादकता के क्षेत्र का विश्लेषण किया गया है तथा शोधकर्ता का प्रयास है कि रीवा के संदर्भ में विकासखण्डों (मनगवां, सिरमौर, मऊगंज, रीवा) को भी शामिल किया गया है।

 

शोध प्रविधि % %

सामाजिक शोध की जटिल प्रक्रिया में शोध के उद्देश्यों की प्राप्ति तथा शोध को सही दिशा देने हेतु एक व्यवस्थित अध्ययन पद्धति को चुना जाता है। शोध के उद्देश्य के आधार पर अध्ययन विषय के विभिन्न पक्षों को स्पष्टता से जानने के लिए पहले से ही एक रूपरेखा बना ली जाती है। शोध की विभिन्न अध्ययन पद्धतियों मे विवेचनात्मक, विश्लेषणात्मक, अनुभवमूलक, सर्वेक्षणात्मक एवं तुलनात्मक अध्ययन पद्धतियां प्रमुख हैं।

 

प्रस्तुत शोध प्रबंध के अध्ययन में अपनायी गयी प्रविधि है कि कृषि व्यवसाय में कृषि यंत्रीकरण से संबधित पत्र-पत्रिकाए, शोध-पत्रों, बुलेटिन, आदि का अध्ययन किया जाएगा। इस कार्यक्रम प्रभावों के मूल्यांकन हेतु हितग्राहियों का चयन कर गांव के लघु, सीमांत कृषकों, भूमिहीन कृषकों से सम्पर्क किया जाएगा।

इस शोध कार्य के व्यक्तिगत साक्षात्कार पद्धति से प्राप्त सूचनाओं तथ्यो, जानकारियां समंको के द्वारा विश्लेषण करने के बाद निष्कर्ष प्राप्त किए जाएगंे। तत्पश्चात् तथ्य समंकलन मास्टर चार्ट निर्माण, बिन्दुरेखीय प्रदर्शन, सारणीयन, चित्रों के द्वारा तथ्यों का विश्लेषण एवं सामान्यीकरण किया जावेगा।

प्रस्तुत अध्ययन को व्यवस्थित ढंग से पूर्ण करने के लिए अनुसंधान की दोनों ही प्रविधियां प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष का प्रयोग किया जायेगा। इसी तरह से प्राथमिक एवं द्वितीयक समंको का प्रयोग भी किया जायेगा। साथ ही प्रकाशित एवं अप्रकाशित स्रोत एवं व्यक्तिगत सर्वेक्षण प्रश्नावली और अनुसूचियों का भी उपयोग किया जायेगा।

 

शोध का औचित्य:

किसी शोध कार्य की शुरुआत किसी उद्देश्य को लेकर होती है। यह उद्देश्य अपना एक विशेष महत्व रखता है। किसी भी शोध प्रबंध कार्य को आरम्भ करने से पहले यह जान लेना अत्यंत आवश्यक है कि वर्तमान शोध क्यों किया जा रहा है ? शोध की समस्यॉयें क्या हैं ? इन समस्याओं का अध्ययन कर सही सुझाव एवं परामर्श देकर, संभावित परिणाम एवं निष्कर्ष तक पहुॅचना ही शोध का औचित्य है। किसी भी शोध कार्य को तभी सकल माना जाता है जब उसका वास्तविक निष्कर्ष निकले एवं सही परिणाम सामने आये तथा परिणाम सार्थक हों।

 

इस अध्ययन के माध्यम से यह जाने का प्रयास किया जायेगा कि फसल उत्पादकता के प्रति आज भी .प्र. के अन्य जिलों की अपेक्षा रीवा जिले में जागरूकता की कमी के कारण आर्थिक विकास में कृषि उत्पादकता निम्न स्तर की है जबकि रीवा जिला संसाधनों से परिपूर्ण है तथा कृषि क्षेत्र में रोजगार के संभावनाओं का भी अध्ययन किया जायेगा।

 

सारणी क्र.1 रीवा जिले में फसल प्रतिरूप में परिवर्तन की प्रवृत्ति

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2009& 10

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2013&14

2014& 15

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2016& 17

2017& 18

2018& 19

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स्त्रोत:- जिला सांख्यिकी पुस्तिका रीवा वर्ष 2009-10 से 2019-20 तक

 

उपरोक्त तालिका का विश्लेषण करने से यह स्पष्ट है कि अध्ययन क्षेत्र रीवा जिले में खाद्यान्न फसलों के प्रति हेक्टेयर औसत उत्पादन में वर्षवार परिवर्तन परिलक्षित होता है। रीवा जिले का भौगोलिक अध्ययन करने से यह स्पष्ट है कि रीवा जिले की मिट्टी, जलवायु, वर्षा, प्राकृतिक वातावरण एवं सिंचाई के साधन उपर्युक्त फसलों के लिए अनुकूल हैं। तालिका में वर्णित फसलों में धान, गेहूं, ज्वार, मक्का, चना, अरहर, मंगफली अलसी तिल सोयाबीन, राई एवं सरसों का प्रति हेक्टेयर औसत उत्पादन वर्ष 2009-10 से 2019-20 तक के उत्पादित फसलों को देखकर पता चलता है कि फसलों के उत्पादन में कमी आयी है और उत्पादकता कृषि यंत्रों के उपयोग के बावजूद भी बहुत ही धीमी गति से बृद्धि हुई। 

 

सारणी क्र. 2 कृषि उत्पादकता से किसानों की आर्थिक स्थिति

Ø-

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(नोट: उपरोक्त आंकड़े प्रतिशत में है)

स्त्रोत: स्वयं के सर्वेक्षण द्वारा।

 

उपरोक्त तालिका से ज्ञात होता है कि रीवा जिले की चयनित तहसीलों में सर्वेक्षित कृषक उत्तरदाताओं से प्राप्त समंकों के आधार पर पूर्व वर्षों की तुूलना में 2015-16 की स्थिति में 11 प्रतिशत की आय में वृद्धि हुई है तथा 2015-16 की तुलना में 2019-20 में 17 प्रतिशत की आय में वृद्धि हुई। तथा पूर्व वर्षों की तुूलना में 2015-16 की स्थिति में 15 प्रतिशत की जीवन स्तर में सुधार हुआ है जबकि 2015-16 की तुलना में 2019-20 में 20 प्रतिशत की जीवन स्तर में सुधार आया है और पूर्व वर्षों की तुूलना में 2015-16 की स्थिति में 14 प्रतिशत की रोजगार के अवसरों में वृद्धि हुई है एवं 2015-16 की तुलना में 2019-20 में 18 प्रतिशत मात्र की रोजगार के अवसरों में वृद्धि हुई।

 

उपसंहार

मानव सभ्यता के विकास में प्रारम्भ से ही कृषि लोगों की आजीविका का प्रमुख साधन रही है। आज भी कृषि विश्व की अधिकांश जनसंख्या का प्रमुख व्यवसाय तथा आय का सबसे बड़ा स्त्रोत है। विकासशील देशो में प्रधान व्यवसाय होने के कारण कृषि राष्ट्रीय आय का सबसे बड़ा स्त्रोत है, रोजगार एवं जीवन-यापन का प्रमुख साधन, औद्योगिक विकास, वाणिज्य एवं विदेशी व्यापार का आधार है कृषि इन देशों की अर्थव्यवस्था की रीढ़ तथा विकास की कुंजी है। कृषि विकास के सोपान पर चढ़कर ही विश्व के विकसित राष्ट्र आज आर्थिक विकास के शिखर पर पहुँच सके है। इग्लैण्ड, जर्मनी, रूस तथा जापान आदि देशों के विकास में कृषि ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई तथा अन्य औद्योगिक कदम के लिए सुदृढ़ आधार प्रदान किया यही कारण है कि प्राचीन काल से लेकर आज तक के विचारकों ने कृषि विकास पर पर्याप्त बल दिया है।

 

कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ एवं विकास की कुंजी है। मानव सभ्यता के विकास के प्रारम्भ से ही कृषि लोगों की आजीविका का प्रमुख साधन रहा है। पिछले दो क्शकों से अधिक अवधि में औद्योगिकरण के संगठित प्रयास के बावजूद कृषि का गौरवपूर्ण स्थान बना हुआ है। ग्रामीण क्षेत्रों की आजीविका का साधन रहा है। आज कृषि विश्व की अधिकांश जनसंख्या का प्रमुख व्यवसाय तथा आय का सबसे बड़ा स्त्रीत है।

 

प्राचीन काल से कृषि विकास पर विशेष ध्यान दिया गया है। आदिकाल से ही विकासशील देशों की जलवायु मानसूनी होने के कारण कृषि का क्षेत्र काफी पिछड़ी थी। इसका मुख्य कारण धरातलीय विषमता, मानसूनी जलवायु निर्भरता, अविकसित तकनीक तथा आधुनिक कृषि यंत्रों उपकरणों की कमी, खेती का आकार छोटा, पड़त भूमि, सिंचाई की कमी, कृषक तथा खेतिहर कृषक, पूँजी की कमी, प्रदेश में कृषि उपयोगी भूमि अपेक्षाकृत कम होने के कारण फसली के उत्पादन को प्रभावित करती रही है।

 

विश्व के अधिकांश राष्ट्र जो आज औद्योगिक राष्ट्री की श्रेणी में आते है। आर्थिक विकास के प्रारम्भिक चरण में कृषि प्रधान ही थे जो कालान्तर में उद्योग प्रधान हो गये। लेकिन भारत जैसे विकासशील राष्ट्र की अर्थव्यवस्था आज मिश्रित अर्थव्यवस्था कहलाते हुए भी पूर्ण स्का से कृषि प्रधान ही है। कृषि उत्पादन अच्छा होने पर भारतीय अर्थव्यवस्था पुष्यित एवं पल्लवित खेती है। इसके विपरीत कृषि उत्पादन पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों के फलस्वरूप आर्थिक ढाँचा चरमरा जाता है। जिस देश में कृषि अर्थव्यवस्था पर इतना प्रभाव रखती है एवं अर्न्तसंरचनात्मक ढाँचे का निर्माण करती हैं वहाँ पर कृषि गाँव से जुड़े हुए लोग, लघु कृषको, कृषि श्रमिकों, लघु एवं कुटीर उद्यमियों तथा ग्रामीण शिल्पकारों जी कि भारत के सच्चे प्रतिनिधी है, कि दशा अत्यंत शोचनीय दुर्भाग्यपूर्ण है। इसका महत्वपूर्ण कारण नवीन उन्नत उपकरणों की कमी है।

 

सुझाव %&

छोटे कृषको को भी आधुनिकीकरण के क्षेत्र में लाया जाना चाहिए इसके लिए निम्नलिखित सुझाव प्रस्तुत है भूमि सुधार कार्यक्रमों को तेजी से लागू किया जाना चाहिए।

·         छोटे कृषको को विभिन्न कृषि क्रय करने के लिए साख सुविधाएँ दी जानी चाहिए।

·         उनकी कृषि यंत्र किराए पर मिलने की सुविधा होनी चाहिए।

·         छोटे कृषको को सहकारी कृषि समितियों में गठित हो जाने के लिए बढ़ावा दिया जाना चाहिए।

·         कृषको को परम्परागत खेती की अपेक्षा आधुनिक खेती या वैज्ञानिक खेती का प्रयोग करना चाहिए ताकि एक वर्ष दो या तीन फरालो का उत्पादन किया जा सकें।

·         गहन कृषि बहुफसलीय कार्यक्रमों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।

·         भूवारण एवं पौधे की रक्षा की जानी चाहिए।

·         फसल बीमा योजना का विस्तार करना चाहिए।

·         सहकारी खेती को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।

·         कृषि के लिए आधुनिक यंत्र (हार्वेस्टर, थ्रेशर, पम्परोटो, हैक्टर, ट्यूबवेल आदि) का उपयोग करना चाहिए।

·         सूखा, बाढ़ नियंत्रण हेतु अनुदान का वितरण।

·         छोटे कृषको का साधनों का क्रय करने के लिए सहकारी बैंक के माध्यम से छोटे कृषको को ऋण प्रदान करना।

·         कृषि उत्पादकता में सुधार हेतु कृषि विशेषज्ञो से सलाह लेना।

·         कृषि विशेषज्ञो की सहायता से उत्पादकता फसलो के उत्पादन हेतु कृषि विशेषज्ञो से परार्मश करना।

·         ग्रामीण क्षेत्र में परिवहन की ग्रामीण क्षेत्र में परिवहन यातायात का अभाव पाया जाता है। जिसके उपरांत अनाज एक स्थान से दूसरे स्थान ले जाने में कठिनाई उत्पन्न होती है।

·         कृपको अपने गांवो तक ही सीमित रहना पड़ता है इसलिए परिवहन की व्यवस्था होनी चाहिए।

 

संदर्भ ग्रन्थ सूची %&

·         अग्रवाल एन.एल. (1996) भारतीय कृषि अर्थतंत्रराजस्थान हिन्दी ग्रन्थ अकादमी, जयपुर।

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·         डॉ0 अग्रवाल डी0पी0 बुन्देलखण्ड क्षेत्र के कृषि पदार्थ विपणन का विवेचनात्मकअनमोल पब्लिकेशन, दिल्ली

·         अरोरा कृष्ण (1973) उर्वरक (संचलन नियंत्रण) आदेश प्रोफेशनल बुल पब्लिशर्स, नई दिल्ली।

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Received on 16.03.2023         Modified on 29.03.2023

Accepted on 12.04.2023         © A&V Publication all right reserved

Int. J. Rev. and Res. Social Sci. 2023; 11(1):24-30.

DOI: 10.52711/2454-2687.2023.00004